सावन
के महीने में महादेव के जलाभिषेक की अटूट परंपरा की शुरुआत
शिव पुराण की कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और
दैत्यों ने अमृत की कामना से क्षीर सागर का मंथन शुरू किया, तो मंदराचल पर्वत
को मथानी और नागराज वासुकी को नेती (रस्सी) बनाया गया. इस मंथन के दौरान सबसे पहले
अत्यंत भयंकर 'हलाहल' (कालकूट) विष प्रकट
हुआ. इस विष की तीव्र ज्वाला और गर्मी से पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया.
यह
पूरी घटना सावन मास के दौरान ही घटित हुई थी. जब ब्रह्मांड को बचाने का कोई और
उपाय नहीं सूझा, तब भगवान शिव ने लोक-कल्याण के लिए उस भयंकर विष का पान कर लिया.
माता पार्वती ने विष के प्रभाव को रोकने के लिए शिव जी के कंठ (गले) को स्पर्श कर
उसे वहीं रोक दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए.
यही
कारण है कि विष की तीव्र ऊष्मा (गर्मी) से महादेव के शरीर को शीतलता प्रदान करने
के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर निरंतर जल अर्पित किया. इसी ऐतिहासिक घटना के
बाद से सावन के महीने में महादेव के जलाभिषेक की अटूट परंपरा की शुरुआत हुई.
समुद्र मंथन का व्यावहारिक और आध्यात्मिक संदेश
धार्मिक
विद्वानों और शिव पुराण के आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार, समुद्र मंथन की यह
कथा केवल एक पौराणिक घटना मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन और मन के भीतर चलने
वाले द्वंद्व को भी दर्शाती है:
मन का मंथन और विकारों का विष: जब कोई व्यक्ति
भक्ति या सत्कर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो उसके भीतर
अच्छे और बुरे विचारों (देवता और असुर) का घर्षण होता है. इस वैचारिक मंथन से सबसे
पहले इंसान के भीतर का क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या रूपी 'विष'
बाहर
आता है.
शिव तत्व में ही विष पचाने की क्षमता: सांसारिक
मनुष्य के लिए दूसरों की कड़वाहट या जीवन के तनाव रूपी विष को पचाना कठिन होता है.
यह क्षमता केवल 'शिव तत्व' (सच्ची भक्ति और असीम धैर्य) में है.
इसलिए जीवन के मानसिक तनाव को महादेव को समर्पित कर देना चाहिए.
पंच इंद्रियों पर संयम का प्रतीक: पौराणिक
कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान विष के बाद कामधेनु सहित पांच दिव्य गाएं निकली
थीं. आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ये पांच गाएं हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों (आँख,
कान,
नाक,
जीभ,
त्वचा)
का प्रतीक हैं. संसार में रहते हुए यदि मनुष्य अपनी इन पांच इंद्रियों को संयम में
रखना सीख जाए, तो उसका जीवन कल्याणकारी बन जाता है.
सावन में शिव भक्ति का वास्तविक सार
धार्मिक
और व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोण से सावन का यह पावन महीना हमें विपरीत
परिस्थितियों में भी शांत रहने का संदेश देता है. जिस तरह महादेव ने संसार की
रक्षा के लिए विष को अपने कंठ में धारण किया, उसी तरह हमें भी
समाज और परिवार में फैली कड़वाहट को भुलाकर प्रेम और सद्भावना का अमृत बांटना
चाहिए. यही सावन में शिव आराधना का असली आध्यात्मिक रहस्य
है.
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